नवभारत टाईम्स में 5.01.2010 को प्रकाशित व्यंग्य
आजकल कुछ समझ ही नहीं आ रहा। पत्नी का मन करता है। कि कार ले ली जाए। बच्चेका मन करता है कि लैपटाॅप ले लूं। तो मेरा मन करता है कि गरमी बहुत लगती है। तो एक ए.सी. ही लगवा लूं। बच्ची का मन एक वीडियो कैमरा लेने का कर रहा है।
आप सोच रहे होंगे। कि क्या इस बार मेरी कोई लाटरी ही निकल गई। पर ऐसा कुछ नहीं है नहीं जनाब यह सारी महिमा किश्तों की है। जिनकी वजह से आजकल मैं ऐसे सपने देखने की हिम्मत कर पा रहा हूं। मेरी भी हालत अजीब सी है। मेरी जेब में एक भी पैसा नहीं हैं। मैं बहुत समझा रहा हूं। पर बाजार में सुनने वाला नहीं है। मैं कह रहा हूं। भई कहंा से चुकाउंगा। पर वे हंस रहे हैं। अरे सब आ जाएगा। आप तो बस ले जाऐं।
मैं भ्रमित हूं। क्या ले जाउं, क्या नहीं ले जाउं। पत्नी व बच्चों की अलग-अलग फरमाईशें है। मैं परेशान हूं। पर देने वाले परेशान नहीं है। वे कहते हैं। सब ले जाउं। अरे भाभीजी कह रही है, बच्चे कह रहे हैं, उनका दिल मत तोड़ो। भाभीजी तो साक्षात देवी हैं और बच्चे तो भगवान के रूप हैं। आप भला उनका दिल कैसे दुखा सकते हैं।
उनकी बात सुनकर मैं चकरा जाता हूं। पत्नी मेरी है, कभी मैनें इतनी चिन्ता नहीं की। बच्चों के बारे में भी वे सोच रहे हैं। बस ले जाइए। क्या है, मामूली सी किश्तें हैं। चैक दिए और फ्री हो लिए।
मैंने दोनों जेबें उसके सामने खाली कर दी। भई कुछ भी नहीं है। पर वो सुन ही नहीं रहा। कोई बात नहीं हंड्र्ेड परसेंट फाईनेंस करने को तैयार है। वो चीजें ही नहीं बेच रहा, दार्शनिक भी है। अरे ले जाओ भाईसाहब। क्या कहा आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। अजी साहब, आजकल आर्थिक हालत तो पूरी दुनिया की खराब है। आप अपनी बात कर रहे हैं। अब अमरीका को ही लो। साहब जो पूरी दुनिया पर राज करता था। आज लोंगो के सामने हाथ पसारे खड़ा है। पर क्या लोग वहंा नहीं जी रहे। आज भी साहब मजे से जी ही रहे हैं। खूब खा पी रहे हैं। अब भाई साहब, भाभीजी की इतनी इच्छा है। कार लेने की तो ले ही लीजिए। कम से उन्हें सोसायटी में नीचा तो नहीं देखना पड़ेगा।
पत्नियंा, जिन्हें कि प्रायः पति को छोड़कर सारी दुनिया की बात सही लगती है।उसे भी लगने लगा कि कार से सार्थक वस्तु तो इस दुनिया में बनी ही नहीं। पर फिर बात पेट्र्ोल पर आकर अटक जाती है। मैं समझाता हूं। कि कार लेना कोई बड़ी बात नहीं है। पर पेट्र्ोल और रखरखाव में बजट धराशायी हो जाएगा। बीवी भी बिचारी इच्छा होते हुए भी चुप रही। पर बेटी फरमाईश कर बैठी।
फिर क्या था, दुकानदार पीछे ही पड़ गया, ‘अजी साहब, अब तो ले लीजिए, बेटी कह रही है। आज थोड़ा घूम भी लेगी, कल से पराए घर जाना है। वहंा पता नहीं कैसा घर मिले। आज आप के राज में थोड़ा सुख भोग लेगी। कल का किसे पता नहीं।’
पत्नी भावुक हो गई। ‘सच कह रहे हो, पर भाईसाहब। पर ये तो कभी ऐसी बात सोचते भी नहीं।’
मैं भला क्या कहता। चुप रहने में ही भलाई थी।
आधुनिक अर्थव्यवस्था का नया रूप था। सब कुछ जायज था। बस चिन्ता एक ही थी कि किसी तरह माल बिके।
पर पत्नी भी कह उठी,‘ वैसे आप सही कह रहे हो भाई साहब पर बात यह है कि इतने रूपयों की किश्त कैसे अफोर्ड कर पाऐंगे। हमें तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।’
वो खिल उठा।,’ आप अच्छी चिन्ता कर रही हैं बहिनजी। हम काहे के लिए हैं। हम हैं ना। किश्तों का समय बढ़वा देंगे। एकदम कम बोझ पड़ेगा। अरे बहिनजी किश्त देने वाले हम थोड़े ही हैं। सब भगवान देता है। उसकी मर्जी के बिना आप गाड़ी ले सकते हैं क्या। जिसने चोंच दी है, वो चुग्गा भी देगा।जो गाड़ी दिलाएगा, वो किश्त का भी जुगाड़ करेगा।’
अंततः क्या करते। लेनी ही पड़ी। सो बस आजकल यही चल रहा है। पूरा बाजार पीछे पड़ा है। अखबार इन्हीं चीजों से हुआ है। ‘इतने कम दामों में पहली बार’ ‘टी0वी0 के साथ डी0वी0डी0 फ्री’ या ‘ करोड़ों के ईनाम’ं। आदमी भी कहंा तक संघर्ष करे। किश्तों के सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं। परिवार भी क्या करे। बस कागज-कलम लेकर बैठा है। रोज नई-नई गणित लगाते हैं। तन्खवाह में से इतने पैसे किश्त में गए। तो बाकी में खर्चा चल ही जाएगा। कैसे भी गुजारा कर लेंगे। दो हजार रूपए की तो बात है। दादाजी वाला कमरा किराए पर दे देंगे। उनका सामान दुछत्ती में शिफट कर देंगे। और कुछ खर्चे कम कर देंगे। कम से कम सामान तो आ जाएगा।
सो आजकल सब-कुछ किश्तमय हो रहा है। आप मुझ पर हंस रहे हैं। पर जनाब, आप अपने आपको देखिए। मुझे तो आप भी किश्तों के भंवर में ही डूबते नजर आ रहे हैं।
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शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
सरदी का एक दिन
अमर उजाला में 30.12.2009 को प्रकाशित
रोजाना की तरह आज भी लेटा। सबसे पहले रजाई में से मुंह निकाला। लेकिन सर्द हवा के कारण उसे पुनः रजाई में देना पड़ा। पर हर स्थिति का एक अंत होता है, सो उठना ही पड़ा। घर का फर्श बर्फ की चटट्ानों सा प्रतीत हो रहा था। बाहर निकलकर देखा सूरज भी मेरी तरह ठिठुर रहा था।
दो-तीन चाय पीकर शरीर इस हालत में आया कि वो थोड़ा हिल सके। शरीर में हरकत होने से श्रीमतीजी का नहाने संबंधी प्रस्ताव आया, जिसे मूल्यवान जल का महत्व समझाते हुए नकार दिया। मैं अपनी इस उपलब्धि पर बहुत खुश था, लगातार सात दिन न नहाकर मैंने कितने अमूल्य जल की बचत की थी।
तभी पत्नी ने मुझे फ्रिज से आटा व सब्जी निकालने को कहा, मैं कंाप गया। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। सो मैंने शरीर को भली-भंाति कम्बल में लपेटा व सावधानी से फ्रिज का दरवाजा खोला। ढके होने के बावजूद शीतलहर का झोंका शरीर को ठिठुरा गया। मैं फौरन रजाई में घुस गया।
थोड़ी देर बाद श्रीमतीजी नाश्ता लेकर आई। सर्दी के दिनों में डाईनिंग-रूम वीरान पड़ा रहता है। बेडरूम का कार्यभार अधिक बढ़ जाता है। नाश्ते के बाद एक नींद लेकर मैंने खाना भी वहीं खाया। आफिस का सही समय निकले एक घंटा बीत चुका था। श्रीमतीजी दुश्मन की तरह मुझे बार-बार आफिस की याद दिला रही थी। क्या करूं, मजबूरी में जाना ही पड़ा।
नाना प्रकार के वस्त्रों में लद-फदकर मैं आफिस की ओर चल पड़ा। मुझे लग रहा था कि बुलेट प्रूफ कपड़े ऐसे ही होते होंगे। अगर गोली भी घुसेगी तो शरीर को नहीं छू पाएगी।
आफिस पहुंचा तो डेढ़ घंटे लेट हो चुका था। चपरासी वहीं धूप में स्टूल लगाकर बैठा हुआ था।
‘क्या बात है बाबूजी, आज जल्दी आ गए। अभी तो कोई नहीं आया।’
मुझे पत्नी पर गुस्सा आ गया। इतनी जल्दबाजी भी ठीक नहीं है। ये शर्मा व वर्मा तो बिस्तर में दुबके रहे होंगे। और यहंा हम सर्दी में परेशान हो रहे हैं। हम भी कोई कम थोड़े ही है। मैंने चपरासी को आवाज लगाई और कुर्सी धूप में निकालने को कहा। चपरासी निरपेक्ष भाव से मुझे देखता रहा। शायद आवाज उसके कानों तक पहुंचने से पहले जम गई थी। हारकर मैं ही कुर्सी निकाल लाया। लंच टाईम तक काफी लोग आफिस आ चुके थे।
कुछ लोग काम के लिए आए भी, उन्हें शीतलहर खत्म होने के बाद आने को कहा। क्या करें, ठंड के मारे पेन ही नहीं खोला जाता। फाईलों के फीते ठिठुरन के मारे खुल ही नहीं पाते। लोगों को भी चैन नहीं है, भरी सर्दी में काम के लिए चले आते हैं।
जाने कैसे आफिस में टाईम पास होता है। मैं ही जानता हूं। सब कुछ चाय के ही सहारे चल रहा है। चाय नहीं होती, तो कैसे पार पड़ता। सूरज छिपने से पहले ही पंछी घोंसलो की ओर चल दिए। शाम की चाय पीने के बाद फिर बिस्तर में घुस गया। फिर खाने की बात होने लगी। बातों की शुरूआत स्वास्थ्य निखारने की बातों से होती है। हरी सब्जियों से प्रारंभ होती हुई फिर नाना प्रकार के पराठों पर खत्म हो जाती है।
सो इसी तरह चल रहा है। ठंड के मारे सारा देश कंाप रहा है। सारा काम ठप्प पड़ा है, लाख कोशिश कर रहे हैं पर हाथ है कि बाहर निकलने का नाम ही नहीं लेते। क्या कह रहे हैं, आप कोशिश करके देखेंगे। अरे रहने दो, थोड़ी गर्मी आ जाने दो, क्यों परेशान हो रहे हो। थोड़े दिन काम नहीं करेंगे तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। सो बस बैठे हैं।
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रोजाना की तरह आज भी लेटा। सबसे पहले रजाई में से मुंह निकाला। लेकिन सर्द हवा के कारण उसे पुनः रजाई में देना पड़ा। पर हर स्थिति का एक अंत होता है, सो उठना ही पड़ा। घर का फर्श बर्फ की चटट्ानों सा प्रतीत हो रहा था। बाहर निकलकर देखा सूरज भी मेरी तरह ठिठुर रहा था।
दो-तीन चाय पीकर शरीर इस हालत में आया कि वो थोड़ा हिल सके। शरीर में हरकत होने से श्रीमतीजी का नहाने संबंधी प्रस्ताव आया, जिसे मूल्यवान जल का महत्व समझाते हुए नकार दिया। मैं अपनी इस उपलब्धि पर बहुत खुश था, लगातार सात दिन न नहाकर मैंने कितने अमूल्य जल की बचत की थी।
तभी पत्नी ने मुझे फ्रिज से आटा व सब्जी निकालने को कहा, मैं कंाप गया। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। सो मैंने शरीर को भली-भंाति कम्बल में लपेटा व सावधानी से फ्रिज का दरवाजा खोला। ढके होने के बावजूद शीतलहर का झोंका शरीर को ठिठुरा गया। मैं फौरन रजाई में घुस गया।
थोड़ी देर बाद श्रीमतीजी नाश्ता लेकर आई। सर्दी के दिनों में डाईनिंग-रूम वीरान पड़ा रहता है। बेडरूम का कार्यभार अधिक बढ़ जाता है। नाश्ते के बाद एक नींद लेकर मैंने खाना भी वहीं खाया। आफिस का सही समय निकले एक घंटा बीत चुका था। श्रीमतीजी दुश्मन की तरह मुझे बार-बार आफिस की याद दिला रही थी। क्या करूं, मजबूरी में जाना ही पड़ा।
नाना प्रकार के वस्त्रों में लद-फदकर मैं आफिस की ओर चल पड़ा। मुझे लग रहा था कि बुलेट प्रूफ कपड़े ऐसे ही होते होंगे। अगर गोली भी घुसेगी तो शरीर को नहीं छू पाएगी।
आफिस पहुंचा तो डेढ़ घंटे लेट हो चुका था। चपरासी वहीं धूप में स्टूल लगाकर बैठा हुआ था।
‘क्या बात है बाबूजी, आज जल्दी आ गए। अभी तो कोई नहीं आया।’
मुझे पत्नी पर गुस्सा आ गया। इतनी जल्दबाजी भी ठीक नहीं है। ये शर्मा व वर्मा तो बिस्तर में दुबके रहे होंगे। और यहंा हम सर्दी में परेशान हो रहे हैं। हम भी कोई कम थोड़े ही है। मैंने चपरासी को आवाज लगाई और कुर्सी धूप में निकालने को कहा। चपरासी निरपेक्ष भाव से मुझे देखता रहा। शायद आवाज उसके कानों तक पहुंचने से पहले जम गई थी। हारकर मैं ही कुर्सी निकाल लाया। लंच टाईम तक काफी लोग आफिस आ चुके थे।
कुछ लोग काम के लिए आए भी, उन्हें शीतलहर खत्म होने के बाद आने को कहा। क्या करें, ठंड के मारे पेन ही नहीं खोला जाता। फाईलों के फीते ठिठुरन के मारे खुल ही नहीं पाते। लोगों को भी चैन नहीं है, भरी सर्दी में काम के लिए चले आते हैं।
जाने कैसे आफिस में टाईम पास होता है। मैं ही जानता हूं। सब कुछ चाय के ही सहारे चल रहा है। चाय नहीं होती, तो कैसे पार पड़ता। सूरज छिपने से पहले ही पंछी घोंसलो की ओर चल दिए। शाम की चाय पीने के बाद फिर बिस्तर में घुस गया। फिर खाने की बात होने लगी। बातों की शुरूआत स्वास्थ्य निखारने की बातों से होती है। हरी सब्जियों से प्रारंभ होती हुई फिर नाना प्रकार के पराठों पर खत्म हो जाती है।
सो इसी तरह चल रहा है। ठंड के मारे सारा देश कंाप रहा है। सारा काम ठप्प पड़ा है, लाख कोशिश कर रहे हैं पर हाथ है कि बाहर निकलने का नाम ही नहीं लेते। क्या कह रहे हैं, आप कोशिश करके देखेंगे। अरे रहने दो, थोड़ी गर्मी आ जाने दो, क्यों परेशान हो रहे हो। थोड़े दिन काम नहीं करेंगे तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। सो बस बैठे हैं।
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नए राज्यों की दौड़ में चांदनी चैक
नवभारत टाईम्स में 29.12.2009 को प्रकाशित व्यंग्य
तेलगांना के नए राज्य की घोषणा से नए-नए राज्यों की मंाग शुरू होने लगी है। इसी तरह चलता रहा तो आने वाले बीस-तीस सालों में देश का न जाने क्या होगा। प्रस्तुत है सन दो हजार पचास में चांदनी चैक के एक वरिष्ठ नेता का आत्मकथ्य।
‘‘सचमुच समझ में नहीं आता। क्या किया जाए। लोग हमारी मंाग को नाजायज बताते हैं। लेकिन यह बिल्कुल गलत है। हमारे इलाके को राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए। पहले ही दिल्ली चार राज्यों में बंटा है। यदि एक राज्य और हो गया। तो किसी का क्या जाएगा। जब पूरा भारत सैकड़ों राज्यों में बंटा हुआ है। तो एक हमारे साथ अत्याचार क्यों किया जाए। अब मुम्बई को ही लो। मराठी-मानुष करते-करते अब वो तो पंाच राज्यों में बंट चुकी है। सुना है अब वहंा भी अंधेरी को दो राज्यों में बंाटने की मुहिम चल रही है। अंधेरी-पूर्व और अंधेरी-पश्चिम।
इसलिए हमें ही लग रहा अब वक्त आ गया है। कि हम इस बात के लिए संघर्ष करना शुरू कर दें। जब इन्होंने कनाट प्लेस को नया राज्य बना दिया तो हम चंादनी चैक वालों ने क्या बिगाड़ा। यहंा हम सैकड़ों साल से पिसे जा रहे हैं और ये नए-नए मोहल्ले राज्यों का दर्जा पा जाते हैं। अब साहब, आप ही देखिए, हमारे साथ कितने अत्याचार किए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा पर्यटक हमारे यहंा घूमने आते हैं। कोई लाल-किले में गंदगी फैला रहा है, तो कोई जामा-मस्जिद जा रहा हैं। कोई यहंा पराठे खाने आ रहा है। तो कोई लस्सी सुड़क रहा है। अरे, भई परेशानी तो हमीं को होती है। हमारे यहंा तो भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है।
अब कितना अच्छा होगा। जब चंादनी चैक में
विधानसभा हो जाएगी। हमारा अपना मुख्यमंत्री होगा। कोई भी हो सकता है। इस बात पर अभी बहस शुरू करना नहीं चाहते। नहीं तो फिर अभी मीडिया विरोध शुरू कर देगी। कि हमने सत्ता पाने के लिए ऐसा किया है। भई, हम तो विकास के मुदद्े को लेकर यह प्रस्ताव लाए हैं। आप हंस रहे हैं, अरे भई अब हमारा विकास होगा। तो क्या पूरे देश का विकास नहीं होगा। कोई हम देश से अलग हैं। हमारे पास पूंजी आएगी तो देश में ही तो इन्वेस्ट करेंगे। बिल्कुल ठेठ देसी आदमी हैं। कोई विदेश लेकर थोड़े ही भाग रहे हैं पूंजी को। अपने चंादनी चैक में कितनी जरूरत है पैसों की।
और फिर कितने कार्यकर्ता हैं। आज इनके मन कितने उदास हैं। जब ये कनाॅटप्लेस वाले कार्यकर्ताओं को लाल बत्ती की गाड़ी में घूमते देखते हैं। तो इनके सीने पर संाप लोट जाता हैं। दिल उदास हो जाता है बिचारों को। ये कल के छोकरे कनाटप्लेस के नए राज्य बनने के कारण विधायक बन बैठे। और बरसों से यहंा जूते घिस रहे हैं। तो यहंा कुछ नहीं हो पा रहा। भई मन तो सभी का करता है। हमने भी जनता की सेवा में जीवन झोंक दिया। अब हमारा मन भी तो सम्मान पाने को करता है।
सो अब हमने पक्का फैसला कर लिया है। बस फौरन मंाग करने वाले हैं। अभी पान की दुकान पर नत्थू से चर्चा की तो वो भी इस बात के लिए राजी था। कि अब तो चंादनी चैक को नए राज्य का दर्जा दे दिया जाए। कार्यकर्ताओं से भी बात चल रही है। वे भला क्यूं मना करेंगे। वो तो बिचारे हाईकमान के आगे कभी कुछ नहीं कहते। और फिर हम ऐसा कर रहे हैं तो कोई हमारा अकेले का फायदा थोड़े ही है। हम तो सदैव से बहुजन-हिताय के लिए सोचते रहते हैं।
अब आप सोच रहे हैं जब हमने सोच ही लिया है। तो फिर परेशानी किस बात की है। फिर मंाग काहे नहीं कर रहा है। प्रधानमंत्री मना करेंगे। नहीं-नहीं, वो बात नहीं है। प्रधानमंत्रीजी तो भले आदमी हैं। कुछ नहीं कहते, देश में कहीं से कोई भी उठकर चला जाता है। वो फौरन दे देते हैं। बहुत अच्छे मन के हैं। किसी का दिल नहीं दुखाते। आप सोच रहे होंगे। जब सब-कुछ ठीक है। तो फिर परेशानी किस बात की। अजी साहब, सही बात तो यह है। कि हमारे देश में एकता ही नहीं है।। इधर हम चांदनी-चैक में नए राज्य की बात कर रहे हैं, सोचते हैं चलो मोहल्ले का विकास हो जाए। पर उधर ये लाल-किले वाले हमारे रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं। सुना है वो भी अलग राज्य की मंाग करने वाले हैं। कहते हैं कि लाल-किले पर हर साल प्रधानमंत्री झंडा फहराते हैं। इसी हिसाब से उनका भी एक अलग राज्य का हक बनता है।
और फिर मैं जानता हूं। कि कोई लाल-किले वाला इसकी मंाग नहीं कर रहा। पर ये परसादी लाल मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में है। भई हम तो कहते हैं। कि चलो मिल-बैठकर बात कर लेंते हैं। भाई-भाई हैं, कुछ भी समझौता कर लेंगे। पर वो मान ही नहीं रहा।अब प्रधानमंत्रीजी तो ठहरे भले मानुष। अगर जोर देंगे तो वे लाल किले को भी अलग राज्य बना देंगे। लेकिन इससे देश की एकता और अंखडता को कितना खतरा है।
पर साहब अब हमने सोच लिया, जो सोच लिया।कोई हमने अकेले ने ही थोड़े देश की एकता का ठेका ले रखा है। हम तो जा रहे हैं बस मंाग करने। बस अब नए राज्य चंादनी चैक की घोषणा होने ही वाली है। सो तैयार हो जाइए।
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तेलगांना के नए राज्य की घोषणा से नए-नए राज्यों की मंाग शुरू होने लगी है। इसी तरह चलता रहा तो आने वाले बीस-तीस सालों में देश का न जाने क्या होगा। प्रस्तुत है सन दो हजार पचास में चांदनी चैक के एक वरिष्ठ नेता का आत्मकथ्य।
‘‘सचमुच समझ में नहीं आता। क्या किया जाए। लोग हमारी मंाग को नाजायज बताते हैं। लेकिन यह बिल्कुल गलत है। हमारे इलाके को राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए। पहले ही दिल्ली चार राज्यों में बंटा है। यदि एक राज्य और हो गया। तो किसी का क्या जाएगा। जब पूरा भारत सैकड़ों राज्यों में बंटा हुआ है। तो एक हमारे साथ अत्याचार क्यों किया जाए। अब मुम्बई को ही लो। मराठी-मानुष करते-करते अब वो तो पंाच राज्यों में बंट चुकी है। सुना है अब वहंा भी अंधेरी को दो राज्यों में बंाटने की मुहिम चल रही है। अंधेरी-पूर्व और अंधेरी-पश्चिम।
इसलिए हमें ही लग रहा अब वक्त आ गया है। कि हम इस बात के लिए संघर्ष करना शुरू कर दें। जब इन्होंने कनाट प्लेस को नया राज्य बना दिया तो हम चंादनी चैक वालों ने क्या बिगाड़ा। यहंा हम सैकड़ों साल से पिसे जा रहे हैं और ये नए-नए मोहल्ले राज्यों का दर्जा पा जाते हैं। अब साहब, आप ही देखिए, हमारे साथ कितने अत्याचार किए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा पर्यटक हमारे यहंा घूमने आते हैं। कोई लाल-किले में गंदगी फैला रहा है, तो कोई जामा-मस्जिद जा रहा हैं। कोई यहंा पराठे खाने आ रहा है। तो कोई लस्सी सुड़क रहा है। अरे, भई परेशानी तो हमीं को होती है। हमारे यहंा तो भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है।
अब कितना अच्छा होगा। जब चंादनी चैक में
विधानसभा हो जाएगी। हमारा अपना मुख्यमंत्री होगा। कोई भी हो सकता है। इस बात पर अभी बहस शुरू करना नहीं चाहते। नहीं तो फिर अभी मीडिया विरोध शुरू कर देगी। कि हमने सत्ता पाने के लिए ऐसा किया है। भई, हम तो विकास के मुदद्े को लेकर यह प्रस्ताव लाए हैं। आप हंस रहे हैं, अरे भई अब हमारा विकास होगा। तो क्या पूरे देश का विकास नहीं होगा। कोई हम देश से अलग हैं। हमारे पास पूंजी आएगी तो देश में ही तो इन्वेस्ट करेंगे। बिल्कुल ठेठ देसी आदमी हैं। कोई विदेश लेकर थोड़े ही भाग रहे हैं पूंजी को। अपने चंादनी चैक में कितनी जरूरत है पैसों की।
और फिर कितने कार्यकर्ता हैं। आज इनके मन कितने उदास हैं। जब ये कनाॅटप्लेस वाले कार्यकर्ताओं को लाल बत्ती की गाड़ी में घूमते देखते हैं। तो इनके सीने पर संाप लोट जाता हैं। दिल उदास हो जाता है बिचारों को। ये कल के छोकरे कनाटप्लेस के नए राज्य बनने के कारण विधायक बन बैठे। और बरसों से यहंा जूते घिस रहे हैं। तो यहंा कुछ नहीं हो पा रहा। भई मन तो सभी का करता है। हमने भी जनता की सेवा में जीवन झोंक दिया। अब हमारा मन भी तो सम्मान पाने को करता है।
सो अब हमने पक्का फैसला कर लिया है। बस फौरन मंाग करने वाले हैं। अभी पान की दुकान पर नत्थू से चर्चा की तो वो भी इस बात के लिए राजी था। कि अब तो चंादनी चैक को नए राज्य का दर्जा दे दिया जाए। कार्यकर्ताओं से भी बात चल रही है। वे भला क्यूं मना करेंगे। वो तो बिचारे हाईकमान के आगे कभी कुछ नहीं कहते। और फिर हम ऐसा कर रहे हैं तो कोई हमारा अकेले का फायदा थोड़े ही है। हम तो सदैव से बहुजन-हिताय के लिए सोचते रहते हैं।
अब आप सोच रहे हैं जब हमने सोच ही लिया है। तो फिर परेशानी किस बात की है। फिर मंाग काहे नहीं कर रहा है। प्रधानमंत्री मना करेंगे। नहीं-नहीं, वो बात नहीं है। प्रधानमंत्रीजी तो भले आदमी हैं। कुछ नहीं कहते, देश में कहीं से कोई भी उठकर चला जाता है। वो फौरन दे देते हैं। बहुत अच्छे मन के हैं। किसी का दिल नहीं दुखाते। आप सोच रहे होंगे। जब सब-कुछ ठीक है। तो फिर परेशानी किस बात की। अजी साहब, सही बात तो यह है। कि हमारे देश में एकता ही नहीं है।। इधर हम चांदनी-चैक में नए राज्य की बात कर रहे हैं, सोचते हैं चलो मोहल्ले का विकास हो जाए। पर उधर ये लाल-किले वाले हमारे रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं। सुना है वो भी अलग राज्य की मंाग करने वाले हैं। कहते हैं कि लाल-किले पर हर साल प्रधानमंत्री झंडा फहराते हैं। इसी हिसाब से उनका भी एक अलग राज्य का हक बनता है।
और फिर मैं जानता हूं। कि कोई लाल-किले वाला इसकी मंाग नहीं कर रहा। पर ये परसादी लाल मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में है। भई हम तो कहते हैं। कि चलो मिल-बैठकर बात कर लेंते हैं। भाई-भाई हैं, कुछ भी समझौता कर लेंगे। पर वो मान ही नहीं रहा।अब प्रधानमंत्रीजी तो ठहरे भले मानुष। अगर जोर देंगे तो वे लाल किले को भी अलग राज्य बना देंगे। लेकिन इससे देश की एकता और अंखडता को कितना खतरा है।
पर साहब अब हमने सोच लिया, जो सोच लिया।कोई हमने अकेले ने ही थोड़े देश की एकता का ठेका ले रखा है। हम तो जा रहे हैं बस मंाग करने। बस अब नए राज्य चंादनी चैक की घोषणा होने ही वाली है। सो तैयार हो जाइए।
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विज्ञापन और मेरी परेशानियां
दैनिक भास्कर: 28.12.2009 को प्रकाशित व्यंग्य
मुझे समझ में नहीं आता, मैं क्या करूं। आखिर बात ही ऐसी है। विज्ञापनों ने मेरी परेशानियंा बढ़ा दी हैं। मैं लाख अपने पर नियंत्रण रखने की कोशिश करता हूं। पर हो नहीं पाता।
किंतु इसमें मेरी गलती नहीं है। मैं सीमित बजट वाला आदमी। भले ही दो समय भरपेट रोटी नहीं खा पाता। लेकिन जैसे ही कैटरीना कैफ मुझसे टी0वी0 पर कहती है। कि तुम यह क्रीम लगाओ। तो मैं भला कैसे इंकार कर सकता हूं। और फिर मैं कहूं भी क्या। कितने प्यार से देखती है वह। आंखों में आंखे डालकर, मुस्कराती हुई। इतने प्यार से तो कभी बीवी ने नहीं देखा। उसने तो अपना सारा समय लड़ाई में ही बिताया। सो मैं मजबूर होकर क्रीम खरीद बैठता हूं।
वाकई बहुत ही अच्छा लगता है। नहीं तो हम तो अपने जमाने में हीरोईन की मुस्कराहट देखने के लिए तरस जाते थे। पर अब जमाना कितना बदल गया है। एक बीस-पच्चीस रूपए की क्रीम के लिए खुद कैटरीना कैफ बोल रही है। सचमुच मेरी तो अंाखें ही गीली हो जाती है। कितनी मजबूर होगी नहीं तो कोई ऐसे बोलता है क्या। और फिर हम गप तो मार नहीं रहे। उसने खुद हमारी अंाखों में झांककर मुस्कराते हुए बोला कि तुम क्रीम ले लो न।
और फिर सही बात तो यह है कि चलो गलती से कह दिया हो तो कोई बात नहीं। भई मुंह से निकल गया। हम जैसे साधारण आदमी से भला ऐसी बातें कोई क्यों करेगा। पर एक घंटे में पंाच-पंाच बार । और वो भी सभी के सामने। एक तरफ हमारा पूरा परिवार बैठा है। दूसरी तरफ कैटरीना प्यार से कहे जा रही थी। हम तो शर्म के मारे मर गए। हमने झट से दूसरा चैनल बदल दिया। पर दीवानगी देखो, वहंा भी कैटरीना कैफ। अब आप ही बताओ। हम क्या करते। एक क्रीम के लिए भला उसका दिल कैसे तोड़ सकते थे। और फिर वो तो बिचारी यहंा तक कह रही थी कि टयूब नहीं खरीद सकते तो कोई बात नहीं दो-दो रूपए के किफायती पाउच ही ले लो। हमसे तो बेइज्जती बर्दाश्त नहीं की गई, हम झट से क्रीम की बड़ी टयूब खरीद लाए।
पता नहीं आजकल हममें ऐसा क्या जादू आ गया। कि सब ही हमारे पीछे पड़े रहते हैं। अब अपनी दीपिका पादुकोण और करीना भी आजकल बार-बार यही बात कहती है। बस लेना है तो यह वाला साबुन ले लो। हमने बहुत कहा कि हम तो भई आजकल कैटरीना के कहने में चल रहे हैं। उसे बुरा लगेगा। पर वो ही बात। बार-बार मुस्कराना, अंाखों मे झांकना। फिर एक बार कहे तो हम ऐसे भी नहीं है कि खरीद ही लें। जब मिले तब एक ही बात। भई यह वाला साबुन ले लो। अब कैसे दिल तोड़ पाते। सो खरीद ही लिया। और वो तीन-तीन बटट्ी। पत्नी को शक भी हुआ। क्या बात है। जिन्दगी भर तो मिटट्ी से नहाते-नहाते बीत गई। अब यह खुशबु वाला साबुन कैसे। अब क्या कहते। बस चुप्पी लगा गए। अब इनकी इज्जत थोड़े ही उछाल सकते थे।
अब और आपको क्या बताऐं। हम तो बड़ी मुसीबत से गुजर रहे हैं। उधर अपने अक्षय भैया एक दस रूपए की बोतल पिलाने के लिए कितने खतरों से गुजरते हैं, मेरा तो दिल दहल जाता है। भैया, एक बोतल के लिए क्यों जान को खतरे में डालता है। जान है तो जहान है। कोई और भले ही दुनिया में तेरी बोतल न पिए। पर मैं तो जरूर पीउंगा। क्यों ट््रक के चपेटे में आ रहा है।
बात यहीं तक थी, तो ठीक था। पर उधर अपने सचिन व धोनी भैया को भी लो। वे भी दिन-रात पीछे पड़े हैं। बार-बार एक ही बात कह रहे हैं। भैया अच्छे व्यंग्य लिखना चाहते हो तो हमारी एनर्जी का सीक्रेट देखो। यह वाला पाउडर दूध में डालकर पीओ। अब कौन बताता है इतनी बड़ी बातें। कौन चिंता करता है। आजकल लोग अपने अलावा किसी दूसरे की तो सोचते ही नहीं है। इतने बड़े खिलाड़ी हैं, देश के लिए खेल रहे हैं। वे बिचारे अपनी जान लगा देते हैं। तो क्या हम उनके कहने से पाउडर दूध में डालकर नहीं पी सकते।
अब इतनी बातें सुनकर बड़ी उलझन में पड़ जाते हैं। क्या किया जाए। हमने भी तय कर लिया। भले ही बिक जाऐं। पी0एफ0 लोन सभी खत्म हो जाऐ। पर इन मासूमों का दिल नहीं तोड़ना है। ये जो भी कहेंगे, वो लेंगे। फैंटेसी बड़ा सुख देती है। सभी लोग इसी के पीछे तो भाग रहे हैं। कर्ज की आखिरी बूंद तक खर्च हो जाए। पर अब इनका ध्यान जरूर रखना है। सो रख रहे हैं।
मुझे समझ में नहीं आता, मैं क्या करूं। आखिर बात ही ऐसी है। विज्ञापनों ने मेरी परेशानियंा बढ़ा दी हैं। मैं लाख अपने पर नियंत्रण रखने की कोशिश करता हूं। पर हो नहीं पाता।
किंतु इसमें मेरी गलती नहीं है। मैं सीमित बजट वाला आदमी। भले ही दो समय भरपेट रोटी नहीं खा पाता। लेकिन जैसे ही कैटरीना कैफ मुझसे टी0वी0 पर कहती है। कि तुम यह क्रीम लगाओ। तो मैं भला कैसे इंकार कर सकता हूं। और फिर मैं कहूं भी क्या। कितने प्यार से देखती है वह। आंखों में आंखे डालकर, मुस्कराती हुई। इतने प्यार से तो कभी बीवी ने नहीं देखा। उसने तो अपना सारा समय लड़ाई में ही बिताया। सो मैं मजबूर होकर क्रीम खरीद बैठता हूं।
वाकई बहुत ही अच्छा लगता है। नहीं तो हम तो अपने जमाने में हीरोईन की मुस्कराहट देखने के लिए तरस जाते थे। पर अब जमाना कितना बदल गया है। एक बीस-पच्चीस रूपए की क्रीम के लिए खुद कैटरीना कैफ बोल रही है। सचमुच मेरी तो अंाखें ही गीली हो जाती है। कितनी मजबूर होगी नहीं तो कोई ऐसे बोलता है क्या। और फिर हम गप तो मार नहीं रहे। उसने खुद हमारी अंाखों में झांककर मुस्कराते हुए बोला कि तुम क्रीम ले लो न।
और फिर सही बात तो यह है कि चलो गलती से कह दिया हो तो कोई बात नहीं। भई मुंह से निकल गया। हम जैसे साधारण आदमी से भला ऐसी बातें कोई क्यों करेगा। पर एक घंटे में पंाच-पंाच बार । और वो भी सभी के सामने। एक तरफ हमारा पूरा परिवार बैठा है। दूसरी तरफ कैटरीना प्यार से कहे जा रही थी। हम तो शर्म के मारे मर गए। हमने झट से दूसरा चैनल बदल दिया। पर दीवानगी देखो, वहंा भी कैटरीना कैफ। अब आप ही बताओ। हम क्या करते। एक क्रीम के लिए भला उसका दिल कैसे तोड़ सकते थे। और फिर वो तो बिचारी यहंा तक कह रही थी कि टयूब नहीं खरीद सकते तो कोई बात नहीं दो-दो रूपए के किफायती पाउच ही ले लो। हमसे तो बेइज्जती बर्दाश्त नहीं की गई, हम झट से क्रीम की बड़ी टयूब खरीद लाए।
पता नहीं आजकल हममें ऐसा क्या जादू आ गया। कि सब ही हमारे पीछे पड़े रहते हैं। अब अपनी दीपिका पादुकोण और करीना भी आजकल बार-बार यही बात कहती है। बस लेना है तो यह वाला साबुन ले लो। हमने बहुत कहा कि हम तो भई आजकल कैटरीना के कहने में चल रहे हैं। उसे बुरा लगेगा। पर वो ही बात। बार-बार मुस्कराना, अंाखों मे झांकना। फिर एक बार कहे तो हम ऐसे भी नहीं है कि खरीद ही लें। जब मिले तब एक ही बात। भई यह वाला साबुन ले लो। अब कैसे दिल तोड़ पाते। सो खरीद ही लिया। और वो तीन-तीन बटट्ी। पत्नी को शक भी हुआ। क्या बात है। जिन्दगी भर तो मिटट्ी से नहाते-नहाते बीत गई। अब यह खुशबु वाला साबुन कैसे। अब क्या कहते। बस चुप्पी लगा गए। अब इनकी इज्जत थोड़े ही उछाल सकते थे।
अब और आपको क्या बताऐं। हम तो बड़ी मुसीबत से गुजर रहे हैं। उधर अपने अक्षय भैया एक दस रूपए की बोतल पिलाने के लिए कितने खतरों से गुजरते हैं, मेरा तो दिल दहल जाता है। भैया, एक बोतल के लिए क्यों जान को खतरे में डालता है। जान है तो जहान है। कोई और भले ही दुनिया में तेरी बोतल न पिए। पर मैं तो जरूर पीउंगा। क्यों ट््रक के चपेटे में आ रहा है।
बात यहीं तक थी, तो ठीक था। पर उधर अपने सचिन व धोनी भैया को भी लो। वे भी दिन-रात पीछे पड़े हैं। बार-बार एक ही बात कह रहे हैं। भैया अच्छे व्यंग्य लिखना चाहते हो तो हमारी एनर्जी का सीक्रेट देखो। यह वाला पाउडर दूध में डालकर पीओ। अब कौन बताता है इतनी बड़ी बातें। कौन चिंता करता है। आजकल लोग अपने अलावा किसी दूसरे की तो सोचते ही नहीं है। इतने बड़े खिलाड़ी हैं, देश के लिए खेल रहे हैं। वे बिचारे अपनी जान लगा देते हैं। तो क्या हम उनके कहने से पाउडर दूध में डालकर नहीं पी सकते।
अब इतनी बातें सुनकर बड़ी उलझन में पड़ जाते हैं। क्या किया जाए। हमने भी तय कर लिया। भले ही बिक जाऐं। पी0एफ0 लोन सभी खत्म हो जाऐ। पर इन मासूमों का दिल नहीं तोड़ना है। ये जो भी कहेंगे, वो लेंगे। फैंटेसी बड़ा सुख देती है। सभी लोग इसी के पीछे तो भाग रहे हैं। कर्ज की आखिरी बूंद तक खर्च हो जाए। पर अब इनका ध्यान जरूर रखना है। सो रख रहे हैं।
बुधवार, 16 दिसंबर 2009
व्यंग्य चिठठ्ी लीक होना
अमर उजाला : 17.12.09 को प्रकाशित
भारतीय डाक-व्यवस्था को लेकर कभी मेरे दिल में श्रद्धा नहीं रही। क्योंकि एक तो उन्होंने कभी चिठठ्ी समय से नहीं पहुंचाई, दूसरा कभी गोपनीयता नहीं बरती। जब भी बीवी मायके से खत लिखती थी तो डाकिया उसे पिताजी के हाथ सौंपकर चल देता था। उस कमबख्त को कभी यह नहीं दिखता था कि उस पर मेरा नाम लिखा हुआ है और साथ ही ‘पिराईवेट’ भी लिखा हुआ है।
पर अकेले डाक-व्यवस्था को दोषी मानने से काम नहीं चलता। मेरे घर वाले भी उतने ही दोषी है। अल्पशिक्षित होने के बाद भी पत्नी जो ‘पिराइवेट’ लिखकर गोपनीयता को बनाए रखने का प्रयत्न करती थी। वो पत्र मिलने के चंद घंटों बात मां द्वारा पूरे मोहल्ले को पता चल जाती थी। मायके में बैठकर जो उद्गार वो समूचे कुनबे के लिए व्यक्त करती थी। वो कुछ देर में कुनबा जान लेता था।
लेकिन इस व्यवस्था के लिए किसे दोष दिया जाए। यह तो हमारी पंरपंराओं में शामिल हो गया है। मायके में बैठी पत्नी जानती थी कि यह चिठठ्ी ससुराल जा रही है। और उस पर ‘प्राइवेट’ लिखना उसको सार्वजनिक बनाने का खुला आमंत्रण है। पर फिर भी वो लिखती थी। आजकल भी यही हो रहा है। पार्टी का एक महत्वपूर्ण नेता चिठठ्ी लिखता हैं और वो फौरन लीक होकर सार्वजनिक हो जाती है।
यह मैं बचपन से देख रहा हूं। हमेशा यही होता रहा है। आदमी खूब ध्यान से चिठठ्ी लिखता है। आसपास देखता है, कोई देख तो नहीं रहा है। अगर कोई आसपास बैठता है तो आड़ कर लेता है। पर किसी को देखने नहीं और फिर उस पर उत्तम क्वालिटी की गोंद लगाता है और बड़े ध्यान से डाक के डिब्बे में डाल आता है। वो देखता है कि दूर-दूर तक कोई चिड़िया भी उसे नहीं देख रही। पर फिर भी चिटठ्ी लीक हो जाती है।
आजकल यही हो रहा है। बिचारे नेता पार्टी को मजबूत करने के लिए चिटठ्ी लिखते हैं, जिसको लिखते हैं, उसके पास पहुंचने से पहले ही लीक हो जाती है। आखिर ऐसा क्यूृं होता है। हमारे यहंा पिराइवेट से लेकर राजनीतिक स्तर पर चिटठियंा इतनी लीक क्यों होती है। क्यों हमारे यहंा दूसरों की चिठठियों को इतने उत्साह से पढ़ा जाता है। प्यारी पत्नी मुझे इतने प्यार से चिठठ्ी लिखती है। वो मेरे प्रति कितनी गंभीर है। कितना ध्यान है उसे मेरा। अपने दुख-दर्द मुझसे बंाट रही है। और ये मेरे घरवाले जर्बदस्ती बीच में टंाग अड़ा देते हैं। वे चिठठ्ी खोलकर सार्वजनिक कर देते हैं।
बचपन से लेकर आजतक लगातार लीक होती चिठठ्यिों की गणित मुझे समझ नहीं आई है। ऐसा क्यों होता है। बहुत सी बातें दिमाग में घूम रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि चिठठ्ी लिखी ही इसलिए जाती है। कि लीक हो सके। अगर लीक न करवाना हो तो शायद लिखी ही नहीं जाए।
जिन चिठठ्यों के लिए मैं अपने घरवालों से नाराज हो गया, या जिसे मैं पत्नी द्वारा एक पति को प्यार से लिखा जाना समझ रहा था। वो कहीं उसने जान-बूझकर घरवालों को अपने प्यारे उद्गारों से परिचित कराने के लिए तो नहीं लिखा। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं बीच में कहीं था ही नहीं। कहीं यह बात तो नहीं है कि उसने जानबूझकर ‘पिराइवेट’ इसीलिए लिखा कि उसे जरूर से जरूर मेरे पिताजी ही खोलें। यानी कि मैं उस चिठठ्ी का नायक नहीं अपितु केवल एक माध्यम ही था।
अब मुझे भी विश्वास हो गया है कि ‘लीक-प्रथा’ के पीछे पंरपरा चल रही है। आदमी को अपना दर्द जमाने तक बंाटना होता है और लीक होने वाली चिठठ्ी लिख बैठता है। वो जिसे लिखता है उसे वाकई चिठठ्ी नहीं लिखता बल्कि उसका उदद्ेश्य यही होता है कि उसे वो लोगों तक पहुंचा सके।
यह सब जानकर मैं पीड़ा से भर गया हूं। अब मुझे घरवालों पर बिल्कुल गुस्सा नहीं आ रहा है। वे भी बिचारे क्या करें। उनका भी इस्तेमाल हुआ है। वे उस चिठठ्ी को लीक नहीं करते तो क्या करते। अब मैं भी कुछ करने की सोच रहा हूं। पर क्या करूं। एक कड़ी चिठठ्ी लिखता हूं। पर पेन उठाते ही हाथ कंापने लग जाते हैं। आप सोचते होंगे क्यांे, अरे भई चिठठ्ी लीक हो गई और पत्नी के हाथ पड़ गई तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा। इसलिए बंद करता हूं।
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भारतीय डाक-व्यवस्था को लेकर कभी मेरे दिल में श्रद्धा नहीं रही। क्योंकि एक तो उन्होंने कभी चिठठ्ी समय से नहीं पहुंचाई, दूसरा कभी गोपनीयता नहीं बरती। जब भी बीवी मायके से खत लिखती थी तो डाकिया उसे पिताजी के हाथ सौंपकर चल देता था। उस कमबख्त को कभी यह नहीं दिखता था कि उस पर मेरा नाम लिखा हुआ है और साथ ही ‘पिराईवेट’ भी लिखा हुआ है।
पर अकेले डाक-व्यवस्था को दोषी मानने से काम नहीं चलता। मेरे घर वाले भी उतने ही दोषी है। अल्पशिक्षित होने के बाद भी पत्नी जो ‘पिराइवेट’ लिखकर गोपनीयता को बनाए रखने का प्रयत्न करती थी। वो पत्र मिलने के चंद घंटों बात मां द्वारा पूरे मोहल्ले को पता चल जाती थी। मायके में बैठकर जो उद्गार वो समूचे कुनबे के लिए व्यक्त करती थी। वो कुछ देर में कुनबा जान लेता था।
लेकिन इस व्यवस्था के लिए किसे दोष दिया जाए। यह तो हमारी पंरपंराओं में शामिल हो गया है। मायके में बैठी पत्नी जानती थी कि यह चिठठ्ी ससुराल जा रही है। और उस पर ‘प्राइवेट’ लिखना उसको सार्वजनिक बनाने का खुला आमंत्रण है। पर फिर भी वो लिखती थी। आजकल भी यही हो रहा है। पार्टी का एक महत्वपूर्ण नेता चिठठ्ी लिखता हैं और वो फौरन लीक होकर सार्वजनिक हो जाती है।
यह मैं बचपन से देख रहा हूं। हमेशा यही होता रहा है। आदमी खूब ध्यान से चिठठ्ी लिखता है। आसपास देखता है, कोई देख तो नहीं रहा है। अगर कोई आसपास बैठता है तो आड़ कर लेता है। पर किसी को देखने नहीं और फिर उस पर उत्तम क्वालिटी की गोंद लगाता है और बड़े ध्यान से डाक के डिब्बे में डाल आता है। वो देखता है कि दूर-दूर तक कोई चिड़िया भी उसे नहीं देख रही। पर फिर भी चिटठ्ी लीक हो जाती है।
आजकल यही हो रहा है। बिचारे नेता पार्टी को मजबूत करने के लिए चिटठ्ी लिखते हैं, जिसको लिखते हैं, उसके पास पहुंचने से पहले ही लीक हो जाती है। आखिर ऐसा क्यूृं होता है। हमारे यहंा पिराइवेट से लेकर राजनीतिक स्तर पर चिटठियंा इतनी लीक क्यों होती है। क्यों हमारे यहंा दूसरों की चिठठियों को इतने उत्साह से पढ़ा जाता है। प्यारी पत्नी मुझे इतने प्यार से चिठठ्ी लिखती है। वो मेरे प्रति कितनी गंभीर है। कितना ध्यान है उसे मेरा। अपने दुख-दर्द मुझसे बंाट रही है। और ये मेरे घरवाले जर्बदस्ती बीच में टंाग अड़ा देते हैं। वे चिठठ्ी खोलकर सार्वजनिक कर देते हैं।
बचपन से लेकर आजतक लगातार लीक होती चिठठ्यिों की गणित मुझे समझ नहीं आई है। ऐसा क्यों होता है। बहुत सी बातें दिमाग में घूम रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि चिठठ्ी लिखी ही इसलिए जाती है। कि लीक हो सके। अगर लीक न करवाना हो तो शायद लिखी ही नहीं जाए।
जिन चिठठ्यों के लिए मैं अपने घरवालों से नाराज हो गया, या जिसे मैं पत्नी द्वारा एक पति को प्यार से लिखा जाना समझ रहा था। वो कहीं उसने जान-बूझकर घरवालों को अपने प्यारे उद्गारों से परिचित कराने के लिए तो नहीं लिखा। कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं बीच में कहीं था ही नहीं। कहीं यह बात तो नहीं है कि उसने जानबूझकर ‘पिराइवेट’ इसीलिए लिखा कि उसे जरूर से जरूर मेरे पिताजी ही खोलें। यानी कि मैं उस चिठठ्ी का नायक नहीं अपितु केवल एक माध्यम ही था।
अब मुझे भी विश्वास हो गया है कि ‘लीक-प्रथा’ के पीछे पंरपरा चल रही है। आदमी को अपना दर्द जमाने तक बंाटना होता है और लीक होने वाली चिठठ्ी लिख बैठता है। वो जिसे लिखता है उसे वाकई चिठठ्ी नहीं लिखता बल्कि उसका उदद्ेश्य यही होता है कि उसे वो लोगों तक पहुंचा सके।
यह सब जानकर मैं पीड़ा से भर गया हूं। अब मुझे घरवालों पर बिल्कुल गुस्सा नहीं आ रहा है। वे भी बिचारे क्या करें। उनका भी इस्तेमाल हुआ है। वे उस चिठठ्ी को लीक नहीं करते तो क्या करते। अब मैं भी कुछ करने की सोच रहा हूं। पर क्या करूं। एक कड़ी चिठठ्ी लिखता हूं। पर पेन उठाते ही हाथ कंापने लग जाते हैं। आप सोचते होंगे क्यांे, अरे भई चिठठ्ी लीक हो गई और पत्नी के हाथ पड़ गई तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा। इसलिए बंद करता हूं।
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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009
व्यंग्य : पेट की खातिर
नई दुनिया संडे में 6.12.09 को प्रकाशित
आजकल मैं बहुत परेशान हूं। क्या करूं, हाजमा ही ठीक नहीं रहता। थोड़ा सा भी ज्यादा खा लेता हूं। तो पेट दुखने लग जाता है। बहुत से डाक्टरों को दिखाया। पर कोई फायदा नहीं हुआ। सभी यही खाते हैं कि पेट का ध्यान रखो। घर पर बीवी से कहता हूं तो वो मुंह बनाती है। ‘ऐसे निगोड़े पेट का भी क्या फायदा, जिसमें दो रोटी भी नहीं पचती। अब लोगों को देखो, हजारों करोड़ो का घोटाला कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते।’
अब मैं भी क्या करूं। मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आती है। वाकई लोग इतने बड़े-बड़े घोटाले कर रहे हैं। हजारों करोड़ रूपए वारे-न्यारे हो जाते हैं। जब भी इनका जिक्र होता है, मैं अपने पेट की ओर देखता हूं। कमबख्त दो सूखी रोटी से ही भर जाता है। पर इनके पेट कितने बड़ें हैं, हजारों करोड़ रूपयों से भी नहीं भर पाते। कितना भी खाते हैं पर सब समा जाता है। जितना घोटाला करते हैं, उतनी ही भूख प्रबल होती चली जाती है। देश में निरंतर ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।अभी कोड़ाजी को ही लो। इतनी कम उम्र में उन्होंनंे यह कमाल कर दिखाया है। एक गरीब मजदूर परिवार में जन्में कोडा के नाम दो हजार करोड़ रूपए का घोटाला दर्ज किया गया है। आखिर कितना मजबूत हाजमा चाहिए। यूं ही कोई दो हजार करोड़ रूपए पचा सकता है।
पर अब क्या किया जा सकता है। हमारा देश धीरे-
धीरे मजबूत हाजमे का देश होता जा रहा है। यहंा भंाति-भांति के लोग हैं। तो भंाति-भांति के पेट भी है। सबकी क्षमता अलग-अलग है। कोई हजार रूपयों में चूं बोल जाता हैं। तो कोई हजार रूपए खाने के बाद डकार नहीं लेता। पर लाख रूपयों पर दिक्कत देने लगता है। कई पेट विविधता लिए हुए रहते हैं। वे हर जगह का पानी पचा लेते हैं। यदि कृषि विभाग में रहते हैं, तो बीज से लेकर कीटनाशक, फसलों तक का बजट हजम कर जाते हैं। वो ही रोडवेज में चल जाऐं तो पेट््रोल, डीजल और यदि सिविल में पहुंच जाऐ तो सीमेंट, लोहा व मजदूरों की मजदूरी तक पचा जाते हैं। और तो और यदि देवस्थान विभाग में पहुंच जाए तो देवताओं के प्रसाद तक से परहेज नहीं करते। राजनीतिक पेट इनमें सर्वोपरि है। इनके पाचन की कोई सीमा नहीं है।
और आजकल तो इन पेटों के साथ एक दिक्कत और हो गई है। कि रोजाना खाने की आदत से इनका कोटा बढ़ गया है। एक निश्चित मात्रा में अगर इन्हें खाने को नहीं मिले तो वे कुछ भी कर सकते हैं। राजनीतिक पेटों के साथ यह बीमारी आम है। इसीलिए वे किसी भी कीमत पर सत्ता का प्रसाद चाहते हैं। इसी से उनके पेट की क्षुधा शांत होती है। इसी कारण से जब सत्ता का सवाल होता है। तो वे सारे सिद्धंात, नियम ताक पर रखकर सत्ता वाली पार्टी से जुड़ जाते हैं। बिचारे करें भी क्या। आखिर पापी पेट के लिए इतना तो करना ही पड़ता है। कुर्सी मिल जाए तो फिर पेट हमेशा सही रहता है।
आजकल मैं भी बस इसी फिराक में रहता हूं। कि मेरा हाजमा भी थोड़ा ठीक हो जाए। कम से और कुछ नहीं तो रिश्वत की मिठाई तो पचा सकूं। बीवी का पेट, जो रूखा-सूखा खाकर खराब हो गया है। तो वो तर माल खाने लायक हो जाए। अब कोई अच्छी जगह ट्र्ंासफर की कोशिश कर रहा हूं। थोड़े घोटाले’ के एंजाईम मिलेंगे। तो पाचन-तंत्र अपने-आप सुधर जाएगा। अब अपने हाथ में है ही क्या। बस ईश्वर से यही प्रार्थना कर सकते हैं। जैसे दूसरों की सुनी, वैसे ही मेरी भी सुन ले। अब मंाग भी थोड़ा ही रहा हूं।
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आजकल मैं बहुत परेशान हूं। क्या करूं, हाजमा ही ठीक नहीं रहता। थोड़ा सा भी ज्यादा खा लेता हूं। तो पेट दुखने लग जाता है। बहुत से डाक्टरों को दिखाया। पर कोई फायदा नहीं हुआ। सभी यही खाते हैं कि पेट का ध्यान रखो। घर पर बीवी से कहता हूं तो वो मुंह बनाती है। ‘ऐसे निगोड़े पेट का भी क्या फायदा, जिसमें दो रोटी भी नहीं पचती। अब लोगों को देखो, हजारों करोड़ो का घोटाला कर जाते हैं और डकार भी नहीं लेते।’
अब मैं भी क्या करूं। मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आती है। वाकई लोग इतने बड़े-बड़े घोटाले कर रहे हैं। हजारों करोड़ रूपए वारे-न्यारे हो जाते हैं। जब भी इनका जिक्र होता है, मैं अपने पेट की ओर देखता हूं। कमबख्त दो सूखी रोटी से ही भर जाता है। पर इनके पेट कितने बड़ें हैं, हजारों करोड़ रूपयों से भी नहीं भर पाते। कितना भी खाते हैं पर सब समा जाता है। जितना घोटाला करते हैं, उतनी ही भूख प्रबल होती चली जाती है। देश में निरंतर ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।अभी कोड़ाजी को ही लो। इतनी कम उम्र में उन्होंनंे यह कमाल कर दिखाया है। एक गरीब मजदूर परिवार में जन्में कोडा के नाम दो हजार करोड़ रूपए का घोटाला दर्ज किया गया है। आखिर कितना मजबूत हाजमा चाहिए। यूं ही कोई दो हजार करोड़ रूपए पचा सकता है।
पर अब क्या किया जा सकता है। हमारा देश धीरे-
धीरे मजबूत हाजमे का देश होता जा रहा है। यहंा भंाति-भांति के लोग हैं। तो भंाति-भांति के पेट भी है। सबकी क्षमता अलग-अलग है। कोई हजार रूपयों में चूं बोल जाता हैं। तो कोई हजार रूपए खाने के बाद डकार नहीं लेता। पर लाख रूपयों पर दिक्कत देने लगता है। कई पेट विविधता लिए हुए रहते हैं। वे हर जगह का पानी पचा लेते हैं। यदि कृषि विभाग में रहते हैं, तो बीज से लेकर कीटनाशक, फसलों तक का बजट हजम कर जाते हैं। वो ही रोडवेज में चल जाऐं तो पेट््रोल, डीजल और यदि सिविल में पहुंच जाऐ तो सीमेंट, लोहा व मजदूरों की मजदूरी तक पचा जाते हैं। और तो और यदि देवस्थान विभाग में पहुंच जाए तो देवताओं के प्रसाद तक से परहेज नहीं करते। राजनीतिक पेट इनमें सर्वोपरि है। इनके पाचन की कोई सीमा नहीं है।
और आजकल तो इन पेटों के साथ एक दिक्कत और हो गई है। कि रोजाना खाने की आदत से इनका कोटा बढ़ गया है। एक निश्चित मात्रा में अगर इन्हें खाने को नहीं मिले तो वे कुछ भी कर सकते हैं। राजनीतिक पेटों के साथ यह बीमारी आम है। इसीलिए वे किसी भी कीमत पर सत्ता का प्रसाद चाहते हैं। इसी से उनके पेट की क्षुधा शांत होती है। इसी कारण से जब सत्ता का सवाल होता है। तो वे सारे सिद्धंात, नियम ताक पर रखकर सत्ता वाली पार्टी से जुड़ जाते हैं। बिचारे करें भी क्या। आखिर पापी पेट के लिए इतना तो करना ही पड़ता है। कुर्सी मिल जाए तो फिर पेट हमेशा सही रहता है।
आजकल मैं भी बस इसी फिराक में रहता हूं। कि मेरा हाजमा भी थोड़ा ठीक हो जाए। कम से और कुछ नहीं तो रिश्वत की मिठाई तो पचा सकूं। बीवी का पेट, जो रूखा-सूखा खाकर खराब हो गया है। तो वो तर माल खाने लायक हो जाए। अब कोई अच्छी जगह ट्र्ंासफर की कोशिश कर रहा हूं। थोड़े घोटाले’ के एंजाईम मिलेंगे। तो पाचन-तंत्र अपने-आप सुधर जाएगा। अब अपने हाथ में है ही क्या। बस ईश्वर से यही प्रार्थना कर सकते हैं। जैसे दूसरों की सुनी, वैसे ही मेरी भी सुन ले। अब मंाग भी थोड़ा ही रहा हूं।
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व्यंग्य जैसे उनके दिन फिरे वैसे सबके दिन फिरे
दैनिक भास्कर:रागदरबारी में 12.12.09 को प्रकाशित
भगवान सबकी सुनता है। उसके घर में देर है अंधेर नहीं। भगवान की मर्जी है तो कुछ भी हो सकता है। गरीब को अमीर बना सकता है तो राजा को रंक बनाने में भी देर नहीं करता। महारानी को गदद्ी से उतार सकता है तो किसी को भी गदद्ी पर बिठा सकता है। आजकल भारतीय क्रिकेट टीम के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
वो भी क्या दिन थे। जब वो सभी से हार जाते थे। कभी उन्होंने भेदभाव नहीं किया। बंगलादेश से लेकर श्रीलंका तक हार जाने के लिए दुनिया में उनका नाम था। कभी भी, कहीं भी, किसी से भी हार जाना उनके स्वभाव में शुमार था। उन्होंने कभी भी चंद ईनामों की खातिर विरोधियों का दिल नहीं दुखाया।
हालंाकि टीम में इतने बड़े-बड़े नाम थे। लेकिन अहंकार तो उन्हें कहीं छू भी नहीं गया था। कितना भी लोग क्रिकेट का भीष्म पितामह बता दें। पर जरूरत के समय उन्होंने कभी भी महाभारत नहीं लड़ी। कलियुग के इस माहौल में उनका व्यवहार सदा सतयुग के दार्शनिक की भंाति रहा। जिसे कभी भी यह भौतिकवाद जीवन छू नहीं पाया।कितनी ही बार मामूली से टारगेट पर अपने विकेट गंवाकर पेवेलियन लौट गए। नेट प्रेक्टिस से सदैव वो बचते रहे। सदा यही सोचते रहे कि चार दिन की जिंदगी है। दो दिन तो मैच खेलने में चले गए, तो बाकी का जीवन शंाति से व्यतीत हो, यही कोशिश करते रहे। उन्होंने खेल को सदैव खेल भावना से लिया। जीत गए तो ठीक है, हार गए तो कोई बात नहीं। उनका दर्शन सदैव समृद्ध रहा। मरने के बाद सब बराबर रहता है, कौन हारा, कौन जीता।
उनका और आलोचना का चोली-दामन का साथ रहा। वे क्रिकेट को छोड़कर सभी क्षेत्रों में नए-नए प्रयोग करते रहे। मन हुआ तो नाच लिए, मन हुआ तो स्टेज पर फिल्मी सितारों के साथ अभिनय कर लिया। फिल्मी अभिनेत्रियों के साथ नाम जोड़कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे केवल पिच पर ही नहीं फिसलते बल्कि प्रेम के मैदान में भी रन आउट हो सकते हैं। वे वाकई क्रिकेट के बादशाह के साथ-साथ प्रेम के युवराज भी हैं।
उन्होंने सदैव देश की भलाई के बारे में सोचा। मंदी के इस दौर में जहंा बाजार को उपभोक्ताओं की जरूरत है। वहंा यह विज्ञापन लिए गली-गली भटकते रहे। आजकल माल बेचने में कितनी मुश्किल होती है। भले ही लोगों को पानी नहीं उपलब्ध हो पाया हो लेकिन वे गरीब-अमीर सभी को समान रूप से शीतल पेय बंाटते रहे। उन्होंने क्या नहीं बेचा। कितना थक जाते थे। इसी थकान के कारण वो विकेट के बीच भागने में कमजोर रहे और कितने ही मौकों पर रन-आउट भी हो जाते थे।
वे सभी एक बड़े योद्धा की भंाति थे। लड़ने में कभी पीछे नहीं हटे। घायल हो जाते थे पर वीरता के कारण चोटों को छिपा-छिपाकर लड़ाई के मैदान में डटे रहते थे।
पर अब सब कुछ बदल गया है। अब वो अच्छा माल भी बेच रहे हैं और क्रिकेट भी अच्छा खेल रहे हैं। देखते-देखते हारने की आदत को उन्होंने जीतने में बदल दिया है। अब चूंकि जीतने लगे हैं इसलिए ‘जो जीता वो ही सिकंदर‘। सो आजकल सभी उनकी अराधना में लगे है। टी0वी0पर, अखबारों में, पत्रिकाओं में सभी जगह पर उनकी ही चर्चा है। सब उनके ही गुण गा रहे हैं। चारों ओर भारतीय टीम के डंके बज रहे हैं।
सारे खिलाड़ी प्रसन्न हैं। आखिर क्यों न हो। पता नहीं कितने दिनों के लिए नंबर वन के पायदान पर हैं। आजकल वक्त का भरोसा नहीं है। बहुत जल्दी-जल्दी स्थितियंा बदलती है। भारतीय टीम को नजर भी जल्दी लगती है। आज हीरो तो कल जीरो बनते भी देर नहीं लगती। े
लेकिन अब जब सब उनकी पूजा-अर्चना में लगे हैं, तो भला मैं क्यांे पीछे हटूं। मैं भी आजकल उनके ही गुण गा रहा हूं। दिन-रात, सुबह-शाम उन्हीं के गीत गा रहा हूं। जब तक वे जीतते रहेंगे, यही माहौल रहेगा। अब और तो भला मैं क्या कर सकता हूं। बस यही प्रार्थना कर सकता हूं। जैसे उनके दिन फिरे, वैसे सबके दिन फेरे।
भगवान सबकी सुनता है। उसके घर में देर है अंधेर नहीं। भगवान की मर्जी है तो कुछ भी हो सकता है। गरीब को अमीर बना सकता है तो राजा को रंक बनाने में भी देर नहीं करता। महारानी को गदद्ी से उतार सकता है तो किसी को भी गदद्ी पर बिठा सकता है। आजकल भारतीय क्रिकेट टीम के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
वो भी क्या दिन थे। जब वो सभी से हार जाते थे। कभी उन्होंने भेदभाव नहीं किया। बंगलादेश से लेकर श्रीलंका तक हार जाने के लिए दुनिया में उनका नाम था। कभी भी, कहीं भी, किसी से भी हार जाना उनके स्वभाव में शुमार था। उन्होंने कभी भी चंद ईनामों की खातिर विरोधियों का दिल नहीं दुखाया।
हालंाकि टीम में इतने बड़े-बड़े नाम थे। लेकिन अहंकार तो उन्हें कहीं छू भी नहीं गया था। कितना भी लोग क्रिकेट का भीष्म पितामह बता दें। पर जरूरत के समय उन्होंने कभी भी महाभारत नहीं लड़ी। कलियुग के इस माहौल में उनका व्यवहार सदा सतयुग के दार्शनिक की भंाति रहा। जिसे कभी भी यह भौतिकवाद जीवन छू नहीं पाया।कितनी ही बार मामूली से टारगेट पर अपने विकेट गंवाकर पेवेलियन लौट गए। नेट प्रेक्टिस से सदैव वो बचते रहे। सदा यही सोचते रहे कि चार दिन की जिंदगी है। दो दिन तो मैच खेलने में चले गए, तो बाकी का जीवन शंाति से व्यतीत हो, यही कोशिश करते रहे। उन्होंने खेल को सदैव खेल भावना से लिया। जीत गए तो ठीक है, हार गए तो कोई बात नहीं। उनका दर्शन सदैव समृद्ध रहा। मरने के बाद सब बराबर रहता है, कौन हारा, कौन जीता।
उनका और आलोचना का चोली-दामन का साथ रहा। वे क्रिकेट को छोड़कर सभी क्षेत्रों में नए-नए प्रयोग करते रहे। मन हुआ तो नाच लिए, मन हुआ तो स्टेज पर फिल्मी सितारों के साथ अभिनय कर लिया। फिल्मी अभिनेत्रियों के साथ नाम जोड़कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे केवल पिच पर ही नहीं फिसलते बल्कि प्रेम के मैदान में भी रन आउट हो सकते हैं। वे वाकई क्रिकेट के बादशाह के साथ-साथ प्रेम के युवराज भी हैं।
उन्होंने सदैव देश की भलाई के बारे में सोचा। मंदी के इस दौर में जहंा बाजार को उपभोक्ताओं की जरूरत है। वहंा यह विज्ञापन लिए गली-गली भटकते रहे। आजकल माल बेचने में कितनी मुश्किल होती है। भले ही लोगों को पानी नहीं उपलब्ध हो पाया हो लेकिन वे गरीब-अमीर सभी को समान रूप से शीतल पेय बंाटते रहे। उन्होंने क्या नहीं बेचा। कितना थक जाते थे। इसी थकान के कारण वो विकेट के बीच भागने में कमजोर रहे और कितने ही मौकों पर रन-आउट भी हो जाते थे।
वे सभी एक बड़े योद्धा की भंाति थे। लड़ने में कभी पीछे नहीं हटे। घायल हो जाते थे पर वीरता के कारण चोटों को छिपा-छिपाकर लड़ाई के मैदान में डटे रहते थे।
पर अब सब कुछ बदल गया है। अब वो अच्छा माल भी बेच रहे हैं और क्रिकेट भी अच्छा खेल रहे हैं। देखते-देखते हारने की आदत को उन्होंने जीतने में बदल दिया है। अब चूंकि जीतने लगे हैं इसलिए ‘जो जीता वो ही सिकंदर‘। सो आजकल सभी उनकी अराधना में लगे है। टी0वी0पर, अखबारों में, पत्रिकाओं में सभी जगह पर उनकी ही चर्चा है। सब उनके ही गुण गा रहे हैं। चारों ओर भारतीय टीम के डंके बज रहे हैं।
सारे खिलाड़ी प्रसन्न हैं। आखिर क्यों न हो। पता नहीं कितने दिनों के लिए नंबर वन के पायदान पर हैं। आजकल वक्त का भरोसा नहीं है। बहुत जल्दी-जल्दी स्थितियंा बदलती है। भारतीय टीम को नजर भी जल्दी लगती है। आज हीरो तो कल जीरो बनते भी देर नहीं लगती। े
लेकिन अब जब सब उनकी पूजा-अर्चना में लगे हैं, तो भला मैं क्यांे पीछे हटूं। मैं भी आजकल उनके ही गुण गा रहा हूं। दिन-रात, सुबह-शाम उन्हीं के गीत गा रहा हूं। जब तक वे जीतते रहेंगे, यही माहौल रहेगा। अब और तो भला मैं क्या कर सकता हूं। बस यही प्रार्थना कर सकता हूं। जैसे उनके दिन फिरे, वैसे सबके दिन फेरे।
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